*मेजर आनंद : ख़्वाबों की मंज़िल का नायक* (भाग--2) - DIGITAL CINEMA

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*मेजर आनंद : ख़्वाबों की मंज़िल का नायक* (भाग--2)


               **अब तक आपने पढ़ा था
                 पडरौना कस्बे से गोरखपुर
                 का सफर तय करते हुई मेजर
                 आनंद फौज की नौकरी के क्रम
                  में बेंगलूर पहुँचे। परिचय हुआ
                  अभिनेता संजय खान से और
                  शुरू हुआ फिल्मी सफर अब
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                  फिल्मों का संसार बड़ा विचित्र है। यहाँ सारा खेल अंधेरे में चलता है। ल्युमिनर ब्रदर्स ने फिल्मों की आधारशिला रखी। चलचित्र जिसका अर्थ होता है चलते फिरते भाव भंगिमा के साथ बोलते चित्र। फिल्मों के साधारण विद्यार्थी को भी मालूम है कि भारत में बनने वाली पहली मूक(आवाज़ रहित) फिल्म का नाम है-'राजा हरिश्चन्द्र' और पहली सवाक(बोलती) फिल्म का नाम है 'आलम आरा'।
'राजा हरिश्चन्द्र' बनाने वाले शख्स का नाम है दादा साहेब फाल्के जिन्होंने भारत में इसे चलन में लाया और इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी के जेवर तक बेच दिये थे। जबकि 'आलम आरा' के निर्माता थे अर्देशिर ईरानी और इस फिल्म विधा ने क्रमवार तरक्की के साथ ऐसी ऊंचाई छू ली है जिसके बारे में जितना भी कहा व लिखा जाय वो कम ही होगा।अंधेरे में चलने वाले इस खेल ने आज पूरी दुनियां में आज एक बड़े उद्योग का रूप धारण कर लिया है। मैं आपको अपनी बात बताऊं यही मेरी इस किताब का मक़सद है। नवोदित प्रतिभाशाली कलाकारों को मार्गदर्शन मिले यह मेरा उद्देश्य है। वो खुद को संघर्ष की आँच में समर्पित करें और सहनशक्ति के साथ अपने कर्मपथ पर अग्रसर रहें....हिम्मत नहीं हारें ताकि सफलता उनके कदम चूमे। यह मायावी नगरी है लेकिन इस माया का सच बड़ा ही कड़वा है।
            इन सब बातों के साथ मैं पुनः फ़्लैश बैक में लौट कर अभिनेता संजय खान का ज़िक्र करना चाहूँगा।मैं उनका पारिवारिक मित्र था और सम्बंध आज कायम है। उनकी पत्नी ज़रीन खान बेहद सहृदय और संवेदनशील महिला हैं। उनके भीतर मैंने स्वयं मातृत्व का समंदर लहराते हुए देखा है। जब कभी संघर्ष के दौर में मेरे पास पैसे की कमी होती थी तो मुझे उनसे पैसे लेने में कोई संकोच नहीं होता था।
             सन 1978 मेरी ज़िंदगी में टर्निंग पॉइंट के रूप में आया।इसी साल मैं शादी के बंधन में बंधा। मेरी हमसफर का नाम है जूली। जूली ने संघर्ष के दिनों में मेरा पूरा साथ दिया और आज भी मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चल रही है। सन 1984 में सात बंगले के विशाल नगर में सपरिवार आया। अब तक ज़िन्दगी मुम्बई में किराये के घरों में गुजारी जिसकी अपनी त्रासदी है। सात बंगले के विशाल नगर में जब मैं रहता था तो मुझे बतौर पेइंग गेस्ट इसी इलाके में ए-2'सौरभ' में अपनी पत्नी जूली के साथ रहना पड़ा। यहाँ से मेरे जीवन की दूसरी पारी शुरू हुई। मेरी मकान मालकिन का नाम था शुभा रेले।वह एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी।अपने दो बेटों के साथ अपने पति के निधन के बाद ज़िन्दगी का निर्वाह कर रही थी। लगभग 40 फिल्मों में काम कर लेने के बाद भी मैं अपने परिवार के साथ रहने के लिए छत की व्यवस्था नहीं कर पाया ये बात मुझे हमेशा कचोटते रहती थी। विवाह एक गहन दायित्व के निर्वाह का मामला होता है। फिल्मों के चमकते सितारों के अलावे औसत कलाकारों, टेक्निशियंस को इस मोर्चे पर लड़ते हुए मैंने उन्हें  मौत के आगोश में सोते देखा था।वैवाहिक जीवन के कालक्रम में सीमा और दिशा दो बेटियों ने जन्म लिया। अब हम दो से चार हो गए थे। फिलवक्त मेरी दोनों बेटियाँ अपने पैरों पर खड़ी हैं एवं अपनी पारिवारिक ज़िन्दगी गुजार रही है और सुखी सम्पन्न है।
मेरी मकान मालकिन शुभा रेले को शराब पीने की लत थी और जिस घर में माँ शराब पिये तो बच्चे कैसे अछूते रह सकेंगे ?,शुभा जी का एक बेटा राज मेरे छोटे भाई जैसा था। ए-2'सौरभ' के एक छोटे से फ्लैट में 8--9 लोग एक साथ जीवन बसर कर रहे थे।मैं दिन रात सोचता रहता था कि आने वाले दिनों में बच्चे बड़े होंगे और परेशानियां बढ़ेंगी....मेरे पास अपनी छत कब होगी ?....,मेरी अंतरात्मा में मुझे आवाज़ दी कि फिल्मों में अभिनय का रोग मुझे लगा है उसका  इलाज करना होगा।इससे किसी भी कीमत पर मुझे दूरी बनानी होगी। इस काम में मेरी सहायता मेरी मकान मालकिन शुभा रेले ने की जैसे उन्होंने मेरी माँ की शक्ल अख्तियार की । उनके पास अपना फोन था और उनके फोन के सहारे मैंने इस्टेट एजेंट का काम शुरू किया। ईश्वर की कृपा से मेरा ये काम चल निकला और इसी 'सौरभ' बिल्डिंग के I विंग में फ्लैट न.220 खरीदने में कामयाब हुआ। इसी सौरभ बिल्डिंग के पास ही अभिनेत्री स्व श्रीदेवी का 'मातृ' बंगला है जिसे अपने जीवन काल में उन्होंने खुद अपनी देख रेख में तैयार करवाया था।वो आज भी उन्हीं के स्वामित्व में मौजूद है।
             फिल्मी कैरियर के काल खंड में मेरी संघर्ष यात्रा के दौरान जिन जिन लोगों ने मेरा तहे दिल से साथ दिया और सहयोग किया उन सबों के प्रति मैं आभार प्रकट करते हुये अपने आख्यान को विराम देना चाहता हूँ।बीते दिनों को याद करता हूँ तो अजीब सा लगता है।कैसे थे वो दिन कैसे थे वो लोग जिनके साथ मैंने ज़िन्दगी के सफर को तय किया सबों के प्रति पुनः आभार व्यक्त करना चाहूंगा।

                  संघर्षरत प्रतिभाओं के लिए मेजर आनंद की संघर्षमय अभिनय यात्रा अपने आप में एक अनूठी मिसाल है जो कठिनाइयों से मुकाबला करते हुए डटे रहे का संदेश देती है।
पुनः मेजर आनंद पर एक शेर याद आ गया....


          काम करो ऐसा कि पहचान बन जाये,
        हर क़दम चलो ऐसे कि निशान बन जाये।
        
           यह ज़िन्दगी तो सब काट लेते हैं,
        ज़िन्दगी ऐसे जियो की मिसाल बन जाये।



प्रस्तुति: काली दास पाण्डेय     


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