राज कपूर की फिल्म-'तीसरी कसम' को क्यों कहा जाता है--- 'सेल्युलाइड पर लिखी कविता' - DIGITAL CINEMA

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राज कपूर की फिल्म-'तीसरी कसम' को क्यों कहा जाता है--- 'सेल्युलाइड पर लिखी कविता'


'तीसरी कसम'को हिंदी सिनेमा की उन चुनिंदा फिल्मों में शुमार किया जाता है जिसमें हिंदी साहित्य की एक बेहद मार्मिक कृति के रेशे रेशे को बुना गया है। फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफाम'  में लेशमात्र भी बदलाव किए बगैर उसकी छोटी छोटी बारीकियों का ध्यान रखा , फिल्म के निर्देशन बासु भट्टाचार्य ने । हालाँकि  बतौर निर्देशक उनकी ये पहली फिल्म थी ,  बाबजूद इसके उन्होंने अपनी गहरी छाप छोड़ी। उनके सामने राज कपूर और वहीदा रहमान जैसे नामी सितारे थे, जिनका पहले से ही अपना बड़ा स्टारडम था। लेकिन  उन्होंने  एक कुशल और गंभीर निर्देशक के रूप में राज कपूर को एक गाड़ीवान (हीरामन) और वहीदा रहमान को  एक नौटंकी बाई ( हीराबाई ) के किरदार पर उनके स्टारडम को कतई हावी नहीं होने दिया। फिर दोनों   मंझे हुए कलाकार थे , इन्होंने खुद अपनी प्रसिद्धि के शिखर से नीचे उतर कर अपनी अपनी भूमिकाओं को बड़ी शिद्दत से निभाया।

अभिनय की दृष्टि से देखे तो 'जागते रहो' राज कपूर की सबसे यादगार फिल्म मानी जाती है। लेकिन मुझे जिस  शिद्दत से वो 'तीसरी कसम' में मौजूद नज़र आते हैं  उतना 'जागते रहो' में भी नहीं लगते । 'तीसरी कसम' में राज कपूर जी कहीं  भी अभिनय करते  नहीं दिखते ।  वह जैसे हीरामन के किरदार में ही एकाकार हो गए । ठीक इसी तरह छींट की सस्ती साड़ी में लिपटी हीराबाई ने भी वहीदा रहमान की प्रसिद्धि को बहुत पीछे छोड़ दिया। कजरी नदी के किनारे उकडू बैठा ठेठ देहाती हीरामन , हीराबाई से पूछता है -- मन समझती हैं न आप ?, तो हीराबाई  जुबान से नहीं आँखों से बोलती है।  दुनिया भर के शब्द ,  आँखों की उस भाषा को शब्द नहीं दे सकते।  तो ऐसी सूक्ष्मताओं से स्पंदित थी --'तीसरी कसम' ।

हमारी हिंदी फिल्मों में लोक तत्व का सर्वदा आभाव रहा है। इस फिल्म में अभावों की ज़िंदगी जीने वाले लोग भी सपनीले कहकहों और लोकगीतों के जरिये खुश रहने के लिए प्रयत्नशील दिखाई देते हैं।  फिल्म के आरंभिक भाग में "चलत मुसाफिर मोह लिया रे पिंजड़े वाली मुनिया...." गीत को पूरी मस्ती से  गाते हुए गाड़ीवान और हीरामन दर्शक के मन को आल्हादित करते लगते हैं।  इसी तरह टप्पर बैलगाड़ी में हीराबाई को जाते देखकर उनके पीछे उत्साह से दौड़ते और "लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनियां...."  गाते बच्चों का हुजूम न केवल हीरामन को कल्पना की दुनिया में ले जाता है जैसे वाकई वह अपनी दुल्हन को विदा कराके अपने साथ ले जा रहा हो और उधर हीराबाई भी भले ही थोड़ी देर के लिए ही सही एक ब्याही दुल्हन के संसार को जीती दिखाई देती है।

फिल्म का  एक मार्मिक  दृश्य मुझे याद आ रहा है ! रास्ते में एक पेड़ की छाया में हीरामन और हीराबाई  खाना कहते हैं और फिर यकायक हीराबाई तेजी से चल कर बैलगाड़ी में आगे  हीरामन की जगह बैठ जाती है, जहाँ से वो बैलों को हाकते हुए गाड़ी चलाता है।  हीरामन कहता है - अरे आप यहाँ कहाँ  बैठ रही हैं  ?, हीराबाई मुस्कुराती हुई  कहती है , अब गाड़ी हम चलाएंगे....  !, हीरामन कहता है -  मज़ाक करने का बहुत आदत है आपको , चलिए उधर आगे खिसक के बैठिये और ये कहता हुआ अपनी जगह बैठ जाता है।  फिर हीराबाई  को जैसे समझाते हुए कहता है --ये  गाड़ी  चलाना औरतों का काम नहीं।  हीराबाई पलट कर सवाल करती है --फिर औरतों का क्या काम है ?  अब हीरामन बड़े सहज भाव से कहता है  ---अजी  औरतों का क्या काम , घर गृहस्थी संभालना , शादी करना , बहू बनना और क्या ! हीराबाई को जैसे आखिरी शब्द मन में  बिध जाता है और उसके  नारीत्व की उद्दाम लालसा को जैसे उसी की बेबसी भीतर से जिझोंड देती है ! उसके मुंह से या कह लो आत्मा से  सिर्फ एक शब्द निकलता है-" बहु" ! हीरामन को लगता है जैसे उसने जाने अनजाने में अपनी बात से दुःख पहुंचा दिया है और इसीलिए  विषयांतर की गरज़ से बात पलटते हुए कहता है --आप मंदिर जाने को कह रही थी न , मंदिर यहाँ से बस थोड़ी दूर  ही है।  हीराबाई कहती है - मंदिर ! मंदिर जाने से क्या होगा ? हीरामन कहता है -- भगवान जी से प्रार्थना करेंगे और मन की मुराद मांगेगे ! हीराबाई जैसे अपनेपन से उसके कांधे पर हाथ रख कर उत्सुकता से  पूछती है -- अच्छा तुम भी मांगोगे , बताओ क्या मांगोगे ? हीरामन थोड़ा लजाते हुए बड़े भोलेपन से बड़ा प्यारा जवाब देता है ---वो तो हम भगवान जी से ही मांगेगे ! बस इसी संवाद के फ़ौरन बाद "लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनियां " गीत गाते बच्चों का हुजूम बैलगाड़ी के पीछे हो लेता है इसी 10 -12 बच्चों के हुजूम में 11 साल का एक बालक मैं था और दूसरा मेरा सहपाठी गिरधारी भी था। इस बात से बेखबर कि कभी इस फिल्म के बारे में , बैल गाड़ी हाँक रहे हीरामन (राज कपूर) और उसमें  लजाती मुस्कुराती सामने  बैठी  हीराबाई ( वहीदा  रहमान ) पर एक दिन लिखूंगा भी !

फिल्म में हीराबाई का चरित्र नौटंकी में काम करने वाली एक नाचने गाने वाली बाजारू औरत का है। लेकिन शैलेन्द्र जी ने कहीं भी इस चरित्र को व्यावसायिक आधार पर कुंठित नहीं होने दिया बल्कि एक नारी के  गरिमामयी और साहसी रूप को भी सामने आने  दिया।  एक नौटंकी बाई होते हुए भी हीराबाई के भीतर एक खूबसूरत आदर्श जिंदगी जीने की ललक पूरी ताकत से मौजूद है और  उसे एक दृश्य में  प्रकट भी किया गया । याद करिये वह सीन , जब जमींदार (इफ्तिखार) हीराबाई पर ताना कसता हुआ कहता है कि ---सती सावित्रियाँ बनाने से नहीं बना करती हैं हीराबाई। तो हीराबाई जैसे  भड़क उठती है और कहती है कि  ---जब आप जैसे लोग सती सावित्रियों को बाज़ारू औरत बना सकते हो तो कोई ऐसा क्यों नहीं हो सकता जो बाजारू औरत को सती सावित्री बना दे। हीराबाई के भीतर भी नारी सुलभ स्वाभिमान और एक लालसा मौजूद दिखाई देती है  कि चार आना फैक कर उसका  नाच देखने वाली इस दुनिया में कोई ऐसा हो जो उसे मन से चाहे , उसे "कुवांरी" समझे , उसे इस तरह अपनी टप्पर बैलगाड़ी में परदे में छिपा कर ले जाये कि कोई देख लेगा तो उसे नज़र लग जाएगी !
हीरामन और हीराबाई के बीच इस अनकहे प्यार से उपजी  तड़प ने ही तीसरी कसम का अंत दहला देने वाला बना दिया था ! हीरामन जी- जान लड़ा कर स्टेशन जा पहुँचता है। हीराबाई को जिस रेलगाड़ी से जाना है वो प्लेटफार्म पर आ चुकी है। दलाल (सी एस  दुबे) को हड़बड़ी है कि कहीं ट्रैन न छूट जाये  वह हीरामन को बुरा भला भी कहता है  ! लेकिन आज  हीरा बाई को महुआ घटवारिन की कहानी ,"दुनियाँ  बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई  , कहे को दुनिया बनाई " और  " सजनवां बैरी हो गए हमार , चिठिया हो तो हर कोई बांचे , भाग न बांचे कोय"  जैसे मर्मान्तक गीत सुनाने वालेे , उससे बक- बक करने वाले  हीरामन की आवाज़ जैसे छिन सी गई है ! फिल्म के इस आखिरी दृश्य में बैचेनी, मिलन की छटपटाहट और जीवन में फिर कभी न मिल सकने की निष्ठुरता सब एक साथ मूर्तिमान हो उठते हैं ! ट्रैन में बैठने  से पहले हीराबाई अब अपनी स्मृतियों का दुशाला हीरामन के कन्धों पर डालते हुए बस इतना कहती है -- "महुआ को सौदागर ने खरीद लिया हीरामन....." 
हीराबाई चली जाती है। लेकिन अपने पीछे प्यार की वह भावना छोड़ जाती है जिसमे ज़िंदगी के तमाम तूल - अरज  और उसकी बेबसी कोई मायने नहीं रखते, कोई किसी से गिला शिकवा भी नहीं करता ,  कोई किसी से कुछ कहता - सुनता भी नहीं है , लेकिन जैसे सब कुछ कह दिया जाता है ! सब कुछ सुन लिया जाता है।
भावनाओं के ऐसे उत्ताप से सजी थी 'तीसरी कसम' और इसीलिए फिल्म कला के मर्मज्ञों ने उसे 'सेल्युलाइड पर लिखी कविता' तक कहा ।

(*****---- कृष्ण कुमार शर्मा के वाल से साभार)





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