* मेजर आनंद : ख़्वाबों की मंज़िल का नायक * - DIGITAL CINEMA

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* मेजर आनंद : ख़्वाबों की मंज़िल का नायक *


         फानूस बन कर जिसकी हिफाज़त हवा करे,
          वो शमा क्या बुझे जिसे रौशन खुदा करे।


                ये शेर प्रेरणादायक शेरों में से एक है और मौजूदा हालात में फौज की नौकरी से फिल्मों तक का सफर तय करने वाले जाबांज फौजी और अभिनेता मेजर आनंद पर अक्षरशः फिट बैठता है।
10 अगस्त 1941 को पडरौना,ज़िला देवरिया(उत्तर प्रदेश) की धरती पर जन्मे  अमर जीत सिंह आनंद उर्फ मेजर आनंद का जीवन काफी संघर्षमय रहा पेश है उनकी कहानी उन्हीं की ज़ुबानी.....
                 सन 1950-51 में मेरी विधिवत शिक्षा डी.ए.वी स्कूल गोरखपुर से आरंभ हुई। सीधे कक्षा 6 में मेरा नाम लिखवाया गया। कक्षा 6 में ही मैं पढ़ाई के अलावा अतिरिक्त गतिविधियों में शामिल होना शुरू कर दिया था। प्रतिफल स्वरूप योग व सूर्य नमस्कार के लिए मझे प्रथम स्थान मिले। हाई स्कूल पास करने के बाद महात्मा गाँधी इंटर कॉलेज से मैने 11वीं कक्षा पास की। यह बताना  अनिवार्य सा लगता है कि पढ़ने के साथ ही सांस्कृतिक गतिविधियों के अलावे खेलों में भी मेरी रुचि बचपन से रही। फुटबॉल मेरा प्रिय खेल रहा है। सन 1958  में बिहार प्रान्त की राजधानी में आयोजित  इंटर यूनिवर्सिटी फुटबॉल टूर्नामेंट में मैं  गोरखपुर यूनिवर्सिटी का प्रतिनिधि बन कर खेला। फुटबॉल के अलावा मैं दौड़ प्रतियोगिताओं में भी भाग लेता था। मैंने 400-500 मीटर की दौड़ प्रतियोगिताओं में अपनी योग्यता प्रमाणित की है।कॉलेज के ज़माने में मुझे मेरे साथी मुझे मिल्खा कह कर बुलाते थे यह बात सन 1960 की है। सर्व विदित है कि मिल्खा सिंह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के धावक थे।

कुछ बातें अपने परिवार के बारे में:

     मेरे पूर्वज अखंड भारत के सीमांत प्रान्त(फंटीयर इस्टेट) से आ कर गोरखपुर जिले के पडरौना कस्बे में बस गए ।उस वक्त देवरिया तहसील हुआ करता था बाद में जिला बना। अब तो पडरौना भी जिला बन गया है। मेरे पिताश्री मोहर सिंह ने अपनी पहली पत्नी के निधन के बाद दूसरी शादी वीरा कौर से की थी जिससे हम छह भाई बहनों का जन्म हुआ। जसबंश कौर सबसे बड़ी बहन थी। इसके बाद थे हर बंश सिंह,हर चरण सिंह,त्रिलोचन सिंह,पांचवें नंबर पर की बहन कुलदीप कौर और मैं अपने  माता पिता की छठी और आखरी संतान था।


फौज की नौकरी:
     मैंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी से सन 1964 में सिविल इंजीनियर की डिग्री ली। इत्तेफ़ाक़ से सन 1963 में ही  अध्यनरत रहने के क्रम में यूनिवर्सिटी कैम्प्स सेलेक्शन में ही मैं फौज के लिए चुन लिया गया था। 1963 में मेरे चयन का आधार बना था भारत चीन युद्ध।1962 की भारत चीन युद्ध के कारण भारत को अपनी प्रतिरक्षा के स्वरूप के विस्तार को लेकर गहन चिंता करना पड़ा और प्रतिफल स्वरूप भारतीय फौज में काफी संख्या में देश के विभिन्न प्रान्तों के युवकों की बहाली हुई थी। मैं देश सेवा में लग गया।फौजी जीवन में 1965 और 1971 जैसे दो युद्धों में शिरकत करने के क्रम में मुझे काफी कुछ सीखने और समझने का मौका मिला और सियालकोट, बंगला देश व अन्य जगहों पर जाने का मौका मिला। मेरी समझ से फौजी जवान सिर्फ युद्ध में ही अपनी प्राणों की आहुति नहीं देते बल्कि जब भी देश को अकाल, महामारी भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जूझना पड़ता है तब भी हम फौज के लोग आम नागरिकों की जान माल की सुरक्षा के लिए दिन रात एक करते हैं और मानव धर्म को निभाते हैं।
              पडरौना कस्बा जो अब उत्तर प्रदेश के जिले की शक्ल अख्तियार कर चुका है का मेजर आनंद यानी मैं बचपन की देहरी लांघ कर जब एक फौजी बना और देश के लिए जान देने की जज्बे से रूबरू हुआ।भारत पाकिस्तान युद्ध व बंगला देश प्रकरण के दौरान मैंने युद्ध की त्रासदी को काफी नज़दीक से महसूस किया।फौज की ज़िंदगी में मौत ही ज़िन्दगी है।आज भी देश के जवानों की याद में इंडिया गेट (दिल्ली) में अमर ज्योति जलती रहती है। एक गीत जिसे स्व कैफ़ी आज़मी ने फिल्म-'हकीक़त' के लिए लिखा है उसकी कुछ पंक्तियां यहाँ पेश करना चाहूंगा------
            साँस थमती गई नब्ज़ जमती गई
             फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया
             कट गये सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं
             सर हिमालय का हमने न झुकने दिया
             मरते मरते रहा बाँकापन साथियों,
             अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों

             ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
                        जान देने की रुत रोज़ आती नहीं......!***



बॉलीवुड में दस्तक
            बतौर फौजी देश की सेवा करते रहने के क्रम में सन 1968 में मेरी पोस्टिंग  बेंगलूर में हुई। यहाँ पर मेरी मुलाकात इत्तेफ़ाक से अभिनेता संजय खान से हुई जो घुड़दौड़ में काफी रुचि रखते थे।उनके घोड़े प्रिंस खातून व अन्य ने अपने वक़्त में काफी नाम कमाया था। मुझे भी फिल्मों में काफी रुचि थी और फिल्में भी काफी देखता था। अतः उस वक़्त संजय खान के प्रति आकर्षण बढ़ा और मैं उनके करीब होता चला गया। मिस्टर पांडु उर्फ गुलाम अली संजय खान के मौसेरे भाई थे। उन्होंने ही मुझे अभिनेता संजय खान से पहली बार मिलवाया था और मुझे पांडु उर्फ गुलाम अली से मिलाने वाले रिटायर्ड बिग्रेडियर मिस्टर कोहली थे जो मेरे फौजी जीवन के सहयोगी थे।
             बेंगलूर में कार्यरत रहने के क्रम में फिल्मी लोगों की बातें सुनते सुनते और साथ रहते रहते फिल्मों की मायावी दुनियां के आकर्षण से मैं अकारण बंध सा गया था। अभिनेता संजय खान से जब मैंने फिल्मों में काम करने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की तो संजय खान ने बहुत हल्के में इसे लिया परंतु इतना जरूर कहा कि अगर फिल्मों में काम करना चाहते हैं तो फिर सर पर कफ़न बांध कर इस समंदर में कूद पड़ें..... हमलोगों से जो भी मदद हो सकेगा वो हम करेंगे। मैं ठहरा फौजी आदमी इस बात को मैं दिल से लगा बैठा और इस दरम्यान मुझे भी लगा कि फिल्म सामाजिक व राजनीतिक बदलाव का हथियार और मनोरंजन का सशक्त माध्यम है।इसके माध्यम से भी देश की सेवा की जा सकती है। इसी विचार के साथ मैं मुम्बई पहुँच कर फिल्मों के लिए हाथ पैर मारने लगा। सन 1973-74 के आस पास अभिनेता संजय खान की फिल्म-'चांदी सोना' फ्लोर पर जाने वाली थी।इस फिल्म में संजय खान ने मुझे एक हास्य अभिनेता की एक महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी। फिल्मों में बतौर अभिनेता काम करने की एक शर्त यह भी होती है कि पर्दे पर दर्शकों के सामने आने के पहले पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से आप अपने बारे में बतायें।चूंकि मेरी पृष्ठभूमि बतौर मेजर आनंद फौजी आदमी के रूप में रही थी अतः मैं खुद ही उस ज़माने में पत्र पत्रिकाओं के दफ़्तर में जाता था और संपादक व सह संपादकों से मिलता था और वे मेरे बारे में तस्वीर के साथ मेरे कारनामों का ज़िक्र करके छापते थे। वैसे तो फिल्मों में मेरी पहली एंट्री फिल्म-'अंधेरा' से हुई।'मेरा वचन गीता की कसम' में मैंने एक बलात्कारी व्यक्ति के किरदार को साकार किया। मैंने 'रफ्तार', 'धर्मात्मा', 'शोले','वतन','गंगा की बेटी','समंदर','नया दौर','घर' और 'भयानक' जैसी लगभग 40 फिल्मों में छोटी बड़ी चरित्र भूमिकाओं के साथ रुपहले पर्दे पर अपनी उपस्थिति दर्ज की। 'अंधेरा' रामसे ब्रदर्स की फिल्म थी जिसमें संजय खान के छोटे भाई समीर खान थे और फिल्म की हीरोईन थी वाणी गणपति इसके निर्देशक थे तुलसी रामसे और केशु रामसे।इस फिल्म के सात खलनायकों में से एक मैं भी था। मेरी दूसरी फिल्म थी-'मेरा वचन गीता की कसम'। इस फिल्म में संजय खान और सायरा बानो की जोड़ी थी। इस फिल्म में मैंने एक क्रूर बलात्कारी की भूमिका निभाई थी।इस कैरेक्टर की चर्चा काफी हुई थी। मेरा चरित्र एक ठरकी मारवाड़ी का था। मेरी डिमांड इस फिल्म के बाद होने लगी। अन्य फिल्मों में काम करने के बाद मेरे खाते में पाँचवीं फिल्म के रूप में निर्देशक रमेश सिप्पी की चर्चित फिल्म-'शोले' दर्ज है,जो 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई थी जिसने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़े।आज भी इस फिल्म का क्रेज कायम है और मेरा कैरेक्टर चोटी वाला डाकू जिसे अमज़द खान गोली मार देते हैं।'शोले' के तीन डाकुओं के ग्रुप में एक मैं भी शामिल था।इस फिल्म के माध्यम से आज भी मैं सिने दर्शकों के दिल में हूँ। मैंने राज कपूर, फ़िरोज़ खान, प्रेम नाथ, डैनी, अमज़द खान, संजीव कुमार, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कई नामचीन अभिनेताओं के साथ काम किया। उनसे मिला प्यार मेरी यादों में है।सुपर स्टार राजेश खन्ना जी मेरे पसंदीदा कलाकार हैं।उनके साथ कोई सीन में काम करने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला लेकिन मैं उनकी फिल्म-'आवाज़' में काम किया है ये फिल्म शक्ति सामंत की थी। ज़िन्दगी बड़ी तेज रफ़्तार से आगे बढ़ती है।अपनी उलझनों को सुलझाने के क्रम में हम थोड़ी देर भले ही रुक जाएं लेकिन ये वक़्त कहाँ रुकता है...ये वक़्त चलता ही रहता है...आदमी ठीक से देख पाता नहीं और परदे पर मंज़र बदल जाता है। समय गुज़रता गया और देखते ही देखते मैंने 80 बसंत पतझड़ देख लिए।
डॉ राही मासूम रज़ा की कृतियों से मैं काफी प्रभावित रहा हूँ। डॉ राही मासूम रज़ा अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके हैं और बतौर लेखक उन्होंने 'आधा गाँव' लिख कर अपनी साख पर एक सशक्त हिंदी साहित्यकार के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज की है। फिल्म संवाद लेखन में तो उनका आला मुकाम है ही।
उनकी कुछ पंक्तियां मुझे याद आ रही हैं पेश है:


इस अंधेरे के सुन सान जंगल में हम
डगमगाते रहे मुस्कुराते रहे
लौ की मानिंद हम लड़खड़ाते रहे
पर कदम अपने आगे बढ़ते रहे
अजनबी शहर में अजनबी रास्ते
मेरी तनहाई पर मुस्कुराते रहे.....!


बड़ी खूबसूरत लाइन लिखी है रज़ा साहब ने। डॉ राही मासूम रज़ा साहब की अन्य रचनाओं ने भी मुझे काफी आत्मबल प्रदान किया और मैंने कभी हार नहीं मानी आगे बढ़ता गया।
           फिल्मों में काम करने का सपना देखना एक तरह से सचमुच सर पे कफ़न बाँधने जैसा ही काम है। जो युवक फिल्म नगरी मुम्बई दूसरे शहरों से फिल्म स्टार बन कर चमकने का सपना अपनी आँखों में ले कर आते हैं उन्हें मैं बताना चाहूँगा कि सपना और हकीक़त में बड़ा फ़र्क होता है। फिल्मों की हकीक़त कुछ ऐसी होती है जैसे दर्द और जख्म के समन्दर में गोते लगाना....इसे मैं विस्तार में बताना चाहूँगा।
फौजी जीवन में देश के लिए शहीद होने के जज्बे की बात कुछ और है किन्तु फिल्मों की रंगीन दुनियां के पीछे छिपे अँधेरे का जो भटकाव होता है वह अत्यधिक दर्दनाक होता है। फिल्मों में कोई अनायास ही राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन,देव आनंद, हेमा मालिनी, जया बच्चन नहीं बनता...दिलीप कुमार और संजीव कुमार तो शायद ही कोई बन पाता है।बड़ी विचित्र कहानी है इस मायावी फिल्म नगरी की।अपने अनुभवों और आँखों देखी बातों को आपके सामने रखना चाहूँगा।


(क़िस्त---1)शेष अगली बार...........

प्रस्तुति: काली दास पाण्डेय






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